Karm aur bhagya


Madhusudan Singh

एक लेकर आया जग में चम्मच सोने का,
दूजा टीन का,
एक बन बैठा था शहंशाह के जैसे जग में,
दूजा हीन सा।।
एक निसदिन इंच खिसकते,अहम में चूर थे,
दूजा कर्मपथ पर,हर पल ही मशगुल थे,
कर दी उसने सत्यानाश,उँच बड़ेरी खोखड़ बाँस,
मगर ज्ञान ना आई लग गई,पाँव में बेड़ी,गर्दन फाँस,
वे ज्ञान की कोई बात,नही थे मानते,
दौलत के मद में ,राह नहीं पहचानते,
खुद बन बैठे हैं इसी जगत में देखो कैसे,
अब हीन सा,
लेकर आये थे जग में चम्मच सोने का,
दूजा टीन का।।1

जैसा को तैसा मिल जाते जग में राजा को रानी,
मूरख को मूरख मिल जाते,मिलते ज्ञानी को ज्ञानी,
कल अज्ञानी थे वही,ज्ञान सिखलाते अब,
थे ज्ञानवान वे,साथ कहाँ रह पाते अब,
सच कहते पूत कपूत तो धन का संचय कैसा,
सब कहते पूत सपूत तो धन का संचय कैसा,
है कर्म बड़ा या भाग्य नहीं हम जानते,
अपनी कर्मों से…

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