Tadapta Insan/तड़पता इंसान


Madhusudan Singh

Images Credit : Google
कलेजा फट रहा माँ का कहीं मासूम रोता है,
ये कैसा धर्म धरती का जहाँ भगवान सोता है।
कहीं पर जात के झगडे,
कहीं हम धर्म में उलझे,
हुए बेसक बहुत विकसित,
मगर दुविधा कहाँ सुलझे,
उलझते नित गए नित अब यहाँ इंसान रोता है,
ये कैसा धर्म धरती का कहाँ अल्लाह सोता है|1
अगर रब है तो क्या लड़ना,
अगर रब है तो क्या डरना,
अगर रब के सभी बन्दे तो फिर,
कोहराम क्या करना,

खडग चलती थी कल तोपों से अब गोला बरसता है,
ये कैसा धर्म धरती का जहाँ इंसान रोता है|2|
फ़िकर धर्मों का सबको है,
सियासत की फिकर सबको,
तड़पते भूख से इंसां मगर,
परवाह है किसको,
मिटा उम्मीद दुनियाँ से,यहाँ शैतान सोता है,
ये कैसा धर्म धरती का जहाँ इंसान रोता है|3
सियासत हँस रहा संग,
हँस रहे हैं धर्म के रक्षक,
भरोसा हम किये जिनपर,
वही बन बैठे हैं…

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